एक नया तरीका: मेट्रो और मुंबई

मुंबई का बुनियादी ढांचा बदल रहा है । शहर में फील्डवर्क करते हुए, कार्ल एडलर ने देखा कि भारत की वित्तीय राजधानी में नए परिवहन मोड महानगर को कैसे नया रूप देंगें ।

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मैं उठता हूँ , तैयार होता हूँ , बाहर जाता हूँ  और चर्चगेट तक लगभग एक किलोमीटर चलकर आता हूँ । मैं जांघ-ऊंचाई वाले बोल्डर और बाड़ की लंबाई के बीच से गुज़रता हूँ, जो फुटपाथ को संकुचित करते हैं । कोई इष्टतम ऊंचाई नहीं है जिस पर मेरी निगाहों को इस तरह  टिका सकूँ कि बाधाओं से बच जाऊं ; यहाँ हर जगह आश्चर्य है, और पूरे दृश्य पर पूरा ध्यान देने की आवश्यकता है। अंत में, मैं चर्चगेट पहुँचता हूँ। मैंने यहाँ और बांद्रा के बीच के लिए एक मासिक पास खरीदा है, इसलिए मुझे टिकट खिड़की के  बाहर कतार में इंतजार नहीं करना पड़ेगा। मुझे अगले तीन सप्ताह तक ऐसा नहीं करना पड़ेगा। मैं लंबे सफेद गलियारे के अंत में मेटल डिटेक्टर से गुज़रता हूँ   और बर्थ में आराम से बैठी चौड़ी बैंगनी ट्रेनों को देखता हूँ ।

प्रत्येक ट्रेन बड़े हरे रंग की संख्याओं और अक्षरों के साथ एक डिस्प्ले के नीचे खड़ी हुई हैं जो इंगित करती है कि ट्रेन कब जा रही है, कहाँ रुकेगी और कहाँ ख़तम  होगी। यह कोड सरल है, लेकिन उन सभी महीनों में इसे क्रैक करने से मुझे ऐसा लगा कि अब मैं मुंबई से हूँ । अब मुझे इसके बारे में सोचने की भी जरूरत नहीं है। मैं उस संकेत के नीचे ट्रेन तक जाता हूं जो मुझे बताता है कि यह एक्सप्रेस नहीं चलती है, कि यह अंधेरी जाती है, और यह दूसरों की तुलना में जल्दी जा रही है। मैं गाड़ी में प्रवेश करता हूं और ओवरहेड पंखे को चालू करने के लिए अपनी सीट के पास एक स्विच फ्लिप करता हूँ । तीस सेकंड के भीतर, हम प्रस्थान करते हैं। दरवाजे बंद नहीं होते हैं, लेकिन यह सामान्य है। माहिम जंक्शन के लिए मेरे पच्चीस मिनट या उससे अधिक की यात्रा में, मेरी कार में भीड़ बढ़ जाती है और लोग उन खुले दरवाजों के पास खड़े हो जाते हैं, और उस \ पट्टी को पकड़ते हैं जो समर्थन के लिए प्रवेश द्वार को द्विभाजित करती है। प्रत्येक स्टेशन पर, सवारी वाहन के रुकने से पहले प्लेटफॉर्म पर कूद जाते हैं, ट्रेन के साथ कुछ मीटर जॉगिंग करते हैं और फिर धीमी गति से चलते हैं। हम माहिम जंक्शन पहुँचते हैं; मैं गाड़ी से बाहर निकलता हूँ और ट्रेन को उत्तर की ओर धुंध में खोते हुए देखता हूं।

मैंने इस यात्रा के बाद लगभग आधा साल, सोमवार से शुक्रवार तक, घनी उष्णकटिबंधीय गर्मी में बिताया। एक शौकिया परिवहन उत्साही और नवोदित विद्वान होते हुए, महानगर की सभी चीज़ों से ज़्यादा, मुंबई की लोकल ट्रेनों ने मुझे आकर्षित किया । इस प्रणाली ने डेढ़ सदी से अधिक समय तक शहर की संचार प्रणाली के रूप में कार्य किया है। सब्सिडाइज्ड किराए से सभी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के मुंबईवासियों को लोकल ट्रैन इस्तेमाल करने का मौका मिलता है । इसकी विशिष्टताएं पौराणिक हैं।। अनगिनत बॉलीवुड फिल्मों में भीड़-भाड़ वाली लोकल ट्रेनों में लटके लोगों के क्लिप होते हैं। पात्र अक्सर वाहनों के अचूक पिंजरे जैसे  हिस्सों में मिलते हैं। मुंबई की लोकल ट्रैन गेटवे ऑफ इंडिया, ताज महल पैलेस होटल और मरीन ड्राइव की आर्ट डेको वाली इमारतें के सामान शहर का प्रतीक हैं । हालांकि, यह खामियों के बिना नहीं है।

मुंबई की लोकल ट्रेनों का सुरक्षा रिकॉर्ड बेहद खराब है। भारत की सरकारी रेलवे पुलिस के मुताबिक 2019 में नेटवर्क के अंदर 2691 लोगों की मृत्यु  हुई थी। इसके अलावा 3194 लोग घायल हुए थे। यह संख्या अन्य शहरों में अकल्पनीय होगी। चलती गाड़ियों से गिरना और  प्लेटफार्मों के बीच से पार करने वाले लोग इन मृत्युओं के मुख्य कारण हैं। स्टेशनों पर जाते समय चलती वाहनों से कूदने से भी लोग घायल हो जाते हैं। भीड़भाड़ ने घंटों की यात्रा को यात्रियों के लिए दुःस्वप्न बना दिया है। गाड़ियों को दो वर्गों में बांटा गया है। प्रथम और द्वितीय श्रेणी में बहुत अधिक अंतर नहीं हैं, लेकिन प्रथम श्रेणी के टिकट की कीमत द्वितीय श्रेणी के किराए से लगभग दस गुना अधिक हैं, जिससे ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जहाँ द्वितीय श्रेणी में अत्यधिक भीड़ होती है और पहले में बहुत अधिक जगह होती है। सिस्टम की सभी विलक्षण और आदर्श धारणाएं खुली ट्रेन के दरवाजे से बाहर निकलती हैं, और यह अहसास होता है कि इस प्रणाली को किसी प्रकार के अपग्रेड सेट की आवश्यकता है।  स्थानीय ट्रेन प्रणाली में एक सीमित सेवा क्षेत्र है। मुंबई में रहने वाली एक युवा पेशेवर, श्रुतिका मणिवन्नन, लोकल ट्रेनों से यात्रा करती हैं, लेकिन सिस्टम की अपेक्षाकृत खराब कनेक्टिविटी पर प्रकाश डाला,”लोकल ट्रेन बड़ी दूरी के लिए सुविधाजनक है क्योंकि यह मुझे यात्रा के समय की बचत करती है, लेकिन मैं इसे छोटी दूरियों के लिए टालती हूँ क्योंकि स्टेशन तक पहुंचने में कुछ समय लगता है”।

इस दबाव को कम करने के लिए, मुंबई ने एक नई मेट्रो प्रणाली बनाने के लिए एक महत्वाकांक्षी परियोजना शुरू की है। यह परियोजना कई मुंबईवासियों के अपने शहर से गुजरने के तरीके को पूरी तरह से बदल देगी। यह लोकल ट्रेनों के लिए एक सुरक्षित, अधिक आरामदायक विकल्प का वादा करती है। नए नेटवर्क में अंततः दस लाइनें शामिल होंगी और दोनों का उद्देश्य उन क्षेत्रों की सेवा करना है जहां वर्तमान में स्थानीय ट्रेन की पहुंच नहीं है या फिर लोकल ट्रैन के अलावा एक और विकल्प प्रदान करती हैं । मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन डेवलपमेंट अथॉरिटी (एम. एम. आर. डी. ए.) के अनुसार, पूरा सिस्टम लगभग 190 किलोमीटर तक फैला होगा।  व्यापक शहरी रेलवे नेटवर्क हासिल करके, मुंबई सडकों पर निजी वाहनों की संख्या में कमी देखने की उम्मीद भी रखता है। अभी तक, केवल एक परिचालन लाइन, लाइन वन है। लाइन वन एक पूर्व-पश्चिम गैलरी में चलती है जिसमें पहले रेलवे कनेक्शन नहीं था और तीन लोकल ट्रेन लाइनों में से दो के बीच महत्वपूर्ण स्थानांतरण स्टेशन प्रदान करती है। इसका निर्माण पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के माध्यम से किया गया था, जिसमें रिलायंस एनर्जी लिमिटेड की 69% हिस्सेदारी थी। इस परियोजना की लागत लगभग 43०० करोड़ रुपये थी और सेवा 2014 में शुरू हुई थी। लाइन वन लेकर अन्य लाइनों पर सवार के अनुभव की जानकारी मिलती है।

मैंने पहली बार 2018 की शरद ऋतु में एक जॉब साइट पर पहुंचने के लिए लाइन वन की सवारी की। एक सहकर्मी और मैं उमस भरी दोपहर में हमारे धारावी कोलीवाड़ा के कार्यालय से सायन स्टेशन तक गए । भीड़-भाड़ का समय अभी शुरू ही हुआ था, और हम मध्य रेलवे की वाहन  में सवार हो गए, जैसे ही वह प्लेटफार्म पर पहुंची । हम पूरी यात्रा के लिए दरवाजों के पास रहे- वाहन  में आगे जाने का मतलब यात्रियों की लगातार बढ़ती भीड़ के पीछे फंसना हो सकता है। हमने ट्रेन को लाइन वन के पूर्वी टर्मिनस घाटकोपर पर छोड़ा और मेट्रो के लिए संकेतों का पालन किया। आखिरकार, हम उज्ज्वल और शानदार मेट्रो स्टेशन पर पहुँचे। हम टिकट खिड़की तक गए, वहां इलेक्ट्रॉनिक टोकन खरीदे और उन्हें टर्नस्टाइल पर चिप रीडर के सामने लगाया । गेट खुल गए और हमने प्लेटफार्म तक एस्क्लेटर ले लिया । हमारे सिर के ऊपर लगे एलसीडी पैनल ने हमें बताया कि अगली ट्रेन सिर्फ दो मिनट में रवाना होगी। जल्द ही, हम वातानुकूलित ट्रेन में चढ़कर बैठ गए। हमने मेट्रो से बाहर शहर को अपने नीचे से गुज़रता देखा और दस मिनट के भीतर, अपने गंतव्य पर पहुंच गए।

बाद में कई बार मैंने लाइन वन की सवारी की, सभी एक साथ मिश्रित होते हैं- लाइन का उपयोग करना सुखद और सीधा है। इस नई प्रणाली में लोकल ट्रेनों की विशेषताओं का अभाव है और यह कभी भी शहरी पहचान का केंद्रबिंदु नहीं हो सकता है, जो लोकल ट्रेनें कई मुंबईवासियों के लिए हैं। लेकिन, यह निस्संदेह नेटवर्क पर जगह खाली कर देगा और ड्राइवरों को निजी वाहनों के साथ आने-जाने का एक व्यवहार्य विकल्प दे सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मेट्रो की बढ़ी हुई सुरक्षा अधिक मुंबईवासियों को कम से कम डर के साथ जीने की अनुमति देगी।


कार्ल एडलर साइंस पो पेरिस में मास्टर के छात्र हैं और इंटरनेशनल ट्रांसपोर्ट फोरम में इंटर्नशिप कर रहे हैं।


2022 के अंत तक मुंबई की मेट्रो की कई अतिरिक्त लाइनों के चालू होने की उम्मीद है।

इंटरनेशनल ट्रांसपोर्ट फोरम दो परियोजनाओं पर भारत में परिवहन को डीकार्बोनाइजिंग पर काम करता है:

डार्बोनिसिंग ट्रांसपोर्ट इन इमर्जिंग इकनोमीस (डीटीईई) – भारत परियोजना का उद्देश्य भारत सरकार और अन्य हितधारकों को परिवहन उपायों की पहचान करने और परिवहन सीओ 2 उत्सर्जन को कम करने और अपने जलवायु लक्ष्यों और एनडीसी को पूरा करने के लिए मार्ग स्थापित करने में मदद करता है । और अधिक जानें

एशिया के लिए एनडीसी ट्रांसपोर्ट इनिशिएटिव (एनडीसी-टीआईए) का उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों के मंत्रालयों, नागरिक समाज और निजी क्षेत्र के बीच समन्वयित परिवहन के लिए प्रभावी नीतियों की एक सुसंगत रणनीति को बढ़ावा देना है। और अधिक जानें

A New Mode: The Metro and Mumbai

Mumbai is in the midst of an infrastructure makeover. Drawing on his fieldwork in the city, Carl Adler looks at how new transport modes in India’s financial capital will reshape the metropolis.

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Hanging out: Mumbai Suburban Railway moves over 7 million commuters daily

I wake up, get ready, go outside and walk the kilometre or so to Churchgate. I weave between thigh-height bollards and lengths of fence that constrict the footpath and occasional gaps in pavement. There is no optimal height at which to fix my gaze to avoid impediments to movement; there are surprises everywhere here, and the entire scene requires full attention. Eventually, I reach Churchgate. I bought a monthly pass for between here and Bandra, so I do not have to wait in the queue snaking out from the ticket window. I will not have to do so for another three weeks. I walk through the metal detector at the end of the long white corridor and look out at the wide purple trains sitting snugly in their berths.

Each train rests under a display with big green numbers and letters that indicate when a train is leaving, where it will stop and where it will end up. This code is simple, but cracking it all those months ago made me feel a little bit more like I belonged here. Now I don’t even need to think about it. I walk to the train under the sign that tells me it does not run express, that it goes to Andheri, and that it is leaving sooner than the others. I enter the carriage and flip a switch near my seat to turn on the overhead fan. Within thirty seconds, we depart. The doors do not close, but this is normal. Over my twenty-five-minute-or-so commute to Mahim Junction, the crowd in my car swells and people stand beside those open doors, gripping the texturised vertical metal bar which bisects the entrance for support. At each station, riders jump onto the platform before the vehicle stops, jogging alongside the train for a few metres and slowing to a walk. We reach Mahim Junction; I exit the carriage and watch the train pull north into the haze.

I spent nearly half a year following this commute, Monday through Friday, in the thick tropical heat. As an amateur transport enthusiast and budding scholar, Mumbai’s local trains stole my attention more than anything else in the metropolis. The system has served as the city’s circulatory system for over a century and a half. Subsidised fares allow access to Mumbaikers from all socioeconomic backgrounds. Its idiosyncrasies are the stuff of legend. Countless Bollywood films feature clips of people hanging out of crowded local trains. Characters often meet in the unmistakable cage-like interiors of cars. Mumbai’s local train system is as emblematic of the city as the Gateway of India, the Taj Mahal Palace Hotel and the Art Deco facades along Marine Drive. It is, however, not without its flaws. 

2.64 billion Mumbai Suburban Railway’s annual riders arguably rate service as the worst anywhere in the world

Mumbai’s local trains have an abysmal safety record. According to India’s Government Railway Police, 2,691 people died within the network in 2019. In addition, 3,194 people were injured. These numbers would be unthinkable in other cities. Falls from moving carriages and people crossing between platforms at rail level are the main causes of these fatalities. People also sustain injuries from jumping from moving cars as they pull into stations. Crowdedness makes rush hour travel a nightmare for commuters. Carriages are broken down into two classes. First and second class do not have many material differences, but first-class ticket prices are around ten times as high as second-class fares, leading to situations where there is intense congestion in second class and a great deal of space in first. All romantic and idealised notions of the system fly out the open train doors on crushing weekday mornings, and the realisation that this system needs some sort of an upgrade sets in. Finally, the local train system has a limited service area. Shrutika Manivannan, a young professional based in Mumbai, commutes with local trains but highlighted the system’s relatively poor connectivity. “[The local train is] convenient for large distances because it saves me on commute time, but I avoid it for shorter ones considering reaching the station itself takes some time”.

“I want my travel to be super cool and modern,” say Mumbaikers on the move

To ease some of this pressure, Mumbai has embarked on an ambitious project to build a new metro system. This project will completely change the way many Mumbaikers move through their city. It promises a safer, more comfortable alternative to local trains. The new network will eventually include ten lines and aims both to serve areas that do not currently have local train access and provide an alternative to some local train routes. According to the Mumbai Metropolitan Region Development Authority (MMRDA), the completed system will stretch over nearly 190 km. By having a more comprehensive urban railway network, Mumbai also hopes to see a reduction in the number of private vehicles on the road. As of now, there is only one operational line, Line One. Line One serves an east-west corridor that did not previously have a railway connection and provides important transfer points between two of the three local train lines. It was constructed through a Public-Private Partnership, with Reliance Energy Limited holding a 69% stake. The project cost about INR 43 billion, and service began in 2014. Riding Line One gives insight into what rider experiences on other lines will be like.

I first rode Line One in the autumn of 2018 in order to reach a job site. A colleague and I walked through the humid afternoon from our office in Dharavi Koliwada to Sion station. Rush hour had just begun, and we crammed into the Central Railways car when it pulled up to the platform. We stayed near the doors for the whole trip- going further into the car could have meant getting stuck behind the ever-swelling mass of commuters. We left the train at Ghatkopar, Line One’s eastern terminus, and followed the signs for the metro. Eventually, we reached the bright and polished metro station. We walked to the ticket window, bought our electronic tokens and waved them in front of the chip reader on the turnstiles. The gates opened and we took the escalator up to the platform. The LCD panels above our heads told us the next train would depart in just two minutes. Soon, we stepped onto the air-conditioned train and sat down. We watched the city roll underneath us and, within ten minutes, had reached our destination.

Turning point: The Mumbai Metro in action

The many subsequent times I have ridden Line One all blend together- using the line is pleasant and straightforward. This new system lacks the local trains’ quirks and it may never be the centrepiece of urban identity that local trains are for many Mumbaikers. But, it will undoubtedly free up space on the network and it may give drivers a viable alternative to commuting with private vehicles. Most importantly, the metro’s enhanced safety will allow more Mumbaikers to live with at least a little less fear.


Carl Adler is a Master student at Sciences Po Paris and is working on an internship at the International Transport Forum.


Several additional lines of Mumbai’s metro are expected to be operational by the end of 2022.

The International Transport Forum works on decarbonising transport in India over two projects:

The Decarbonising Transport in Emerging Economies (DTEE) – India project aims to help India’s government and other stakeholders to identify transport measures and establish pathways to reduce transport CO2 emissions and meet their climate goals and NDCs. Learn more

The NDC Transport Initiative for Asia (NDC-TIA) aims at promoting a coherent strategy of effective policies for decarbonising transport that are co-ordinated among various sector ministries, civil society and the private sector. Learn more

The wind may be free, but it’s not easy to catch

Shipping is rediscovering sail power thanks to innovative projects reaping promising results on the high seas. Selwyn Parker sets sail to find out how, and when, ships may once again be powered by the wind.

Within the next few months, one of Japan’s biggest shipowners, Mitsui OSK, will send a giant wind-assisted coal carrier to sea in an experiment that is being closely watched by the entire maritime sector.

The vessel of 88 900 deadweight tonnes will fly a 52-metre high “hard sail”, retractable to less than half the height, that is designed to convert the wind into, in effect, free propulsion.

Mitsui’s Wind Challenger shows impressive early results

Called the Wind Challenger project, Mitsui has been quietly working on the technology for 13 years and will put it to the test in the Southern Hemisphere autumn. In terms of fuel saved, the shipping group estimates the additional power provided by the sail will enable it to cut the vessel’s greenhouse gas emissions by between five and eight per cent.

If the technology operates to expectations, Mitsui says it may install sails on other big vessels in what would mark another step forward in the belated effort to harness the wind for commercial shipping.

The wind is free. Yet shipping has largely ignored it since sail-powered cargo vessels all but disappeared from the world’s oceans. Until the last three or four years, that is.

Quite suddenly, wind-powered technology is evolving rapidly. Currently, shipowners have a choice of seven different systems, including rotor sails, hard or rigid sails (like Mitsui’s), soft sails, kites, suction wings and turbines.

And the penny is dropping. Gavin Allwright, the secretary of the International Windship Association, tells me: “The industry is waking up to the fact that wind-assist (and primary wind) propulsion systems are needed in the toolbox of decarbonisation solutions. Perception has shifted, especially in Europe but increasingly in Asia too.”

While it’s early stages in the rediscovery of wind, he estimates that the number of installations globally will double over the next 12 months to about 40. And that’s just on larger ships like tankers, roll-on/roll-offs, large bulkers and general cargo, among others. 

About 20 smaller vessels, including cruise ships, already use soft-sail rigs, with more on order.

Largely unnoticed outside the industry, wind-assisted technology is moving rapidly from an experimental process to everyday use. One of several shipping groups to take the plunge, German ferry group Scandlines will in May 2022 install a second Norsepower-built rotor sail on its hybrid-powered Berlin, following successful trials on a sister ship sailing across the Baltic Sea to Denmark where prevailing winds are favourable.

Rotor wind power: German’s Scandlines hybrid ferry in operation

According to chief operating officer Michael Guldmann Petersen, the retractable, chimney-like sail achieved the targeted reductions in CO2 emissions of four to five per cent, quite enough to make the trial permanent. Other shipping groups report similar or better results. The Maersk shipping giant, for instance, calculates an average improvement of 8.2 per cent in fuel efficiency after 12 months of sea trials on a tanker.

Many of the wind-power projects have the backing of emissions-conscious governments. Mitsui’s Wind Challenger programme is funded from Tokyo, while Scandlines’ rotor sail is one of the beneficiaries of the Wind Assisted Ship Propulsion (WASP) project supported by a EUR 4.5m grant from the European Regional Development Fund.

Governments have high hopes for wind-powered ships. A five-year-old EU report estimated up to 10 700 installations by 2030, while UK’s Clean Maritime plan is even more hopeful, anticipating about 40 000 vessels – or up to 45 per cent of the fleet – will be sail-driven to some extent by 2050.

So far, shipping groups plying coastal routes have led the charge and most of them have gone for hard sails, notably from the factories of Netherlands eConowind and Finland’s Norsepower. The latter specialises in rotors, a modernised version of a 100-year-old technology that can deliver fuel savings of up to 25 per cent in the right conditions.

Here, due recognition is appropriate. Anton Flettner was a German aviation engineer who devised what some still call the Flettner rotor. Long before his time, he saw that a spinning cylinder, using the Magnus effect, could harness and boost energy from the wind. A rotor-powered ship crossed the Atlantic as long ago as 1925. However, the shipping industry was looking the other way and Flettner’s rotor was forgotten for the best part of a century.

But Anton Flettner’s day has finally come. Another coastal trader, Netherlands’ Boomsma Shipping, has opted for eConowind’s foldable VentiFoil. Not dissimilar to rotors, it operates on a principle known as boundary layer-suction created by ventilators mounted inside the aerofoils. Boomsma hopes for savings of ten per cent.

A demo of the Ventifoil in action

The wind may be free, but there have been teething troubles in harnessing it. Some shipping groups tell me it’s been a steep learning curve for the crew of some vessels, for instance, in maintaining and deploying sails. And some manufacturers have had to send their sails back to the workshop after storm battering.

While all this technology is about adding power, one shipping group prides itself on deriving all its propulsion from the wind, save for a small engine to be used in port. In mid-February, Brittany-based Grain de Sail placed an approximately EUR 10m order for the construction of an aluminium cargo schooner that will transport fine products, mainly coffee, chocolates and wines, across the Atlantic and sail back with raw materials. The yacht will have a payload capacity of 35 tonnes, seven times more than its predecessor currently plying the oceans, plus bulk liquid tanks. Each crossing should take about two weeks.

The first of the fleet: Brittany’s Gain de Sail’s first sailing cargo ship is already in operation

Being driven 99 per cent by the air flowing across its 1 170 square metres of sails, the vessel’s crew costs are cut to the bone. Although the schooner will carry a crew of about nine, just two will be able to handle it at any one time.


Selwyn Parker is an independent journalist and author of Chasing the Chimney Sweep about the first Tour de France of 1903.


The International Transport Forum’s report on Navigating Towards Cleaner Maritime Shipping shares lessons from the Nordic Region’s work to meet energy and environmental policy goals, including energy diversification, cutting air pollution and reducing greenhouse gas emissions. Get the report